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शनिवार, 11 दिसंबर 2010

गज़ल

आँख मॅ स्वपन कब था किसी रात का
दर्द दिल मॅ था शायद तेरी घात का
तूने मुड़ कर मेरी सिम्त देखा नही
मुझे अफ़सोस कब हॅ तेरी बात का
कितने मन्ज़र बहारों के थे हर तरफ़
याद आता हॅ वो दिन तेरे साथ का
क्युं मॅ समझू ये चाल किस की रही
मुझ को अफ़सोस कब हॅ किसी मात का

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

अस्तित्व


इन ज़ड़ो मे खोजो मुझे
इन घड़ो मे खोजो मुझे
इन दरो-दीवारो मे
रास्ते के शह्सवारो मे
खोजो मुझे
ज़मीनो-ओ-आसमानो मे
अनकही दास्तानो मे
खोजो मुझे
क्या कभी मै था
या तुम थे
जैसे दरीया का पानी

मंगलवार, 2 मार्च 2010

रोबोट

पहले आदमी -आदमी था
वो हँसता था रोता था किसी के लिऐ
उस में संवेदना थी
दूसरे के लिऐ वेदना थी
आज आदमी- आदमी नहीं
वो हँसता नहीं
रोता नहीं किसी के लिऐ
वो संवेदनहीन है
पत्थर का स्टैचू है
कंप्युटर से दिमाग चलता है
स्वार्थ के लिऐ आंकङे फिट रखता है
आज आदमी- आदमी नहीं
शायद.... रोबोट है

सोमवार, 1 मार्च 2010

माँ

खिले फिर गुलाब
सावन भी बरसा
बीते दिन गए कहाँ
मन रह रह तरसा
फिर आई बहारे
भँवरे भी डोले
रूठे थे जो कल
ना आए फिर वो पल
सब कुछ है घर में
कँप्युटर पोर्च मे कार भी
माँ की दुआऐँ गयी कहाँ
जैसे नजरे थक गयी वहाँ

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

सवाल..सवाल.

कैसे पृथ्वी का जन्म हुआ


कैसे सूर्योदय हुआ


क्यों फिर रात आई


चाँद सितारों को साथ लाई


डायनासोर के काल में


पिरामिडों के साल में


दूर रेगिस्तान में


तूतनखामन के जाल में


मछली सा तडपता


मगरमच्छों से बचता


कैसे जन्म मेरा हुआ


एक सवाल माँ से पूछता


माँ ऊपर आकाश की ओर देखती......

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

जीवन...


सफर एक गुलिस्ताँ का

काटों फूलो के साथ

गर घायल दिल भी है

तो फूल बिखरे हैं जिस्म-जिस्म

मुझ से मत पूछो अब कुछ

कैसे बीता ये जीवन

वो कहता है अच्छा

मैं कहता हूँ बस ठीक

ना शिकायत तुझ से

ना शिकवा किसी से कोई....।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

निंदिया सबसे प्यारी तू...लोरी व प्रभाती गीत संग्रह प्रकाशित


सुविख्यात बालकवि डा0 अजय जनमेजय का लोरी व प्रभाती गीत संग्रह - निंदिया सबसे प्यारी तू -अविचल प्रकाशन,बिजनौर से 18 फरवरी 2009 को प्रकाशित हो गया है इस संग्रह में 44 लोरियाँ व 20 प्रभाती गीत संग्रहीत हैं पुस्तक में सुदर लोरी व गीतों के साथ सुंदर चित्रांकन हरिपाल त्यागी व आवरण शकील बिजनौरी का है पुस्तक के पेपर बैक संसकरण का मूल्य -165 रू0 है
पुसतक की एक लोरी की बानगी देखिये...निंदिया तोरे, करूँ निहोरे
अब आ भी जा,अब आ भी जा
झम्मक झइयाँ झम्मक झइयाँ ।
मुन्ना रोए, पलके भारी
सोना चाहे तू आ जा री
आते-आते रूक मत जाना
ठइयाँ ठइय़ाँ ठइयाँ ठइय़ाँ ।
बनकर शीतल झोंका तू आ
खुशबू सारे उपवन की ला,
धीरे-धीरे आहिस्ता से
पइयाँ पइय़ाँ पइय़ाँ पइय़ाँ ।
जागेगा तब कुछ ठुनकेगा
गोदी को मेरी मचलेगा,
आकर गोदी में नाचेगा ।
छम्मक छइयाँ छम्मक छइयाँ ।