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बुधवार, 24 दिसंबर 2008

जीनियस रफी -24 दिसंबर जन्मदिन पर विशेष








मोहम्मद रफी कितने जीनियस थे इस बात का खुलासा संगीतकार रवि ने किया कि सिंगापुर में स्टेज प्रोग्राम चल रहा था फिलम - `अपना बना के देखो" का गीत- राज ए दिल उनसे छुपाया ना गया , काफी लोकप्रिय हो रहा था स्टेज पर यह गीत गाते हुऐ रफी गीत की लय भूल गये मगर रफी ने गीत को एक अलग ही लय में गा कर श्रोताओ की वाहवाही लूट ली । फिलम- अपना बना के देखो


संगीतकार- रवि


गीतकार- असद भोपाली


गायक - मोहम्मद रफी





गीत को सुन ने के लिये यहाँ क्लिक कीजिए - http://www.guruji.com/

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

आवाज के जादूगर-मोहम्मद रफी (24दिसंबर1924- जन्मदिन)




मोहम्मद रफी जिन का नाम लेते ही संगीत के खजाने खुल जाते हैं आवाज के इस जादूगर का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के छोटे से गांव कोटला सुलतानसिंह में हुआ था मोहम्मद रफी ही विशव के एकमात्र गायक हैं जिन्होनें सर्वाधिक नायको को आवाज दी, पृथ्वीराज कपूर की तीन पीढियों को स्वर देने का एकमात्र श्रेय भी रफी को ही जाता है वर्ष 1970 से 72 तक किशोर कुमार वेव के चलते रफी साहब को 2 वर्षो तक लगभग खाली बैठना पडा तब किसी के पूछने पर कि आजकल किशोर के गीत बज रहे हैं आप के नहीं, इसपर रफी साहब ने मुस्कुरा कर जवाब दिया कि किशोर के सुर किशोर के पास हैं मेरे सुर मेरे पास। सच ही कहा था रफी साहब ने। छठे दशक में बिनाका गीतमाला में प्रत्येक सप्ताह 16 गीत बजते थे जिसमे 12 गीत रफी साहब के होते थे शेष अन्य गायक गायिकाओ के..क्रमश

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

वक्त का देखा मैंने................

मैंने देखा शीशे को



शीशे ने देखा मुझे



समझ ना आया



बचपन की यादें



जवानी की बातें



बुढापे की झुर्रियाँ



सच, वक्त को देखा मैंने शीशे में

अव्वल से आखीर तक....................

फिर दूर
बहुत दूर
जहाँ पुकार सके न कोई
शून्य में डूब चुके
सवालों को उभार सके न कोई
और हाँ, धरती के किसी छोर तक
मैं तो क्या,
सूरज भी हार जाता भोर तक
क्या मिलेगा उसे
क्या मिला है मुझे
कुछ किताबों का बोझ उठाए
अव्वल से आखीर तक
सबको उलझाए
एक बार फिर
अपने अस्तित्व को ही
भूल जाएँ
माँ की गोद में
बचपन को बुला लाएँ
---(दूर कहीं सन्नाटा है से)

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

जीवन का आभास....................

एक दिन मैं
चलता जा रहा था
उस दिशा को
जिसका मुझे भी पता न था
एक दिन मैं देख रहा था
अनंत फैले आकाश को
हवा में हिलती डालियों को,
एक पल मैं सोच रहा था
शायद जिंदगी भोग रहा था
एक रात मैं सो रहा था
शायद सपने बो रहा था
एक दिन/शाम को
मैं खामोश बैठा
पर्वतों को निहार रहा था
प्रिय को दुलार रहा था

एक दिन मैं
पीडा से तडप रहा था
बिजली सा कडक रहा था
शायद जीवन का आभास कर रहा था ।
---(दूर कहीं सन्नाटा है से)

शनिवार, 22 नवंबर 2008

शून्य.......मैं शून्य हूँ

आज

ऐक सवाल मैं

स्वयं से पूछ रहा हूँ
मैं कोन हूँ...
तुम कोन हो..
वो कोन है..
जब मुझे
मेरा ही पता नहीं
तो फिर
मैं किसे खोज रहा हूँ
मैं ....
मैं शून्य हूँ
तुम.....

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

कितना तन्हा हूँ....

एक हवा का झोंका आया
बंद पडे दरवाजे को
किसी कोने में खडे पोधे को
कँपा गया
मुझे कुछ याद दिला गया
कुछ बिसरा गया
क्या कुछ बदला है..
वैसे ही तो शाम है
वैसे ही सुबह, रात है
नहीं.....तो फिर
कहाँ गये मेरे अपने
बचपन के मीठे सपने
सरहदों के उस पार जाने का जोश
कितना तन्हा हूँ जब से आया मुझे होश
- (दूर कहीं सन्नाटा है से)