मैंने देखा शीशे को
शीशे ने देखा मुझे
समझ ना आया
बचपन की यादें
जवानी की बातें
बुढापे की झुर्रियाँ
सच, वक्त को देखा मैंने शीशे में
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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008
अव्वल से आखीर तक....................
फिर दूर
बहुत दूर
जहाँ पुकार सके न कोई
शून्य में डूब चुके
सवालों को उभार सके न कोई
और हाँ, धरती के किसी छोर तक
मैं तो क्या,
सूरज भी हार जाता भोर तक
क्या मिलेगा उसे
क्या मिला है मुझे
कुछ किताबों का बोझ उठाए
अव्वल से आखीर तक
सबको उलझाए
एक बार फिर
अपने अस्तित्व को ही
भूल जाएँ
माँ की गोद में
बचपन को बुला लाएँ
---(दूर कहीं सन्नाटा है से)
बहुत दूर
जहाँ पुकार सके न कोई
शून्य में डूब चुके
सवालों को उभार सके न कोई
और हाँ, धरती के किसी छोर तक
मैं तो क्या,
सूरज भी हार जाता भोर तक
क्या मिलेगा उसे
क्या मिला है मुझे
कुछ किताबों का बोझ उठाए
अव्वल से आखीर तक
सबको उलझाए
एक बार फिर
अपने अस्तित्व को ही
भूल जाएँ
माँ की गोद में
बचपन को बुला लाएँ
---(दूर कहीं सन्नाटा है से)
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
जीवन का आभास....................
एक दिन मैं
चलता जा रहा था
उस दिशा को
जिसका मुझे भी पता न था
एक दिन मैं देख रहा था
अनंत फैले आकाश को
हवा में हिलती डालियों को,
एक पल मैं सोच रहा था
शायद जिंदगी भोग रहा था
एक रात मैं सो रहा था
शायद सपने बो रहा था
एक दिन/शाम को
मैं खामोश बैठा
पर्वतों को निहार रहा था
प्रिय को दुलार रहा था
एक दिन मैं
पीडा से तडप रहा था
बिजली सा कडक रहा था
शायद जीवन का आभास कर रहा था ।
---(दूर कहीं सन्नाटा है से)
चलता जा रहा था
उस दिशा को
जिसका मुझे भी पता न था
एक दिन मैं देख रहा था
अनंत फैले आकाश को
हवा में हिलती डालियों को,
एक पल मैं सोच रहा था
शायद जिंदगी भोग रहा था
एक रात मैं सो रहा था
शायद सपने बो रहा था
एक दिन/शाम को
मैं खामोश बैठा
पर्वतों को निहार रहा था
प्रिय को दुलार रहा था
एक दिन मैं
पीडा से तडप रहा था
बिजली सा कडक रहा था
शायद जीवन का आभास कर रहा था ।
---(दूर कहीं सन्नाटा है से)
शनिवार, 22 नवंबर 2008
शून्य.......मैं शून्य हूँ
आज
ऐक सवाल मैं
स्वयं से पूछ रहा हूँ
मैं कोन हूँ...
तुम कोन हो..
वो कोन है..
जब मुझे
मेरा ही पता नहीं
तो फिर
मैं किसे खोज रहा हूँ
मैं ....
मैं शून्य हूँ
तुम.....
ऐक सवाल मैं
स्वयं से पूछ रहा हूँ
मैं कोन हूँ...
तुम कोन हो..
वो कोन है..
जब मुझे
मेरा ही पता नहीं
तो फिर
मैं किसे खोज रहा हूँ
मैं ....
मैं शून्य हूँ
तुम.....
मंगलवार, 18 नवंबर 2008
कितना तन्हा हूँ....
गुरुवार, 13 नवंबर 2008
सन्नाटा.......................कविता
सन्नाटे को
कभी जाना है तुम ने ।
दूर तक फैले पर्वतों को
सदियो से खामोश
पत्थरों को..
बर्फ की चादर ओढे
शिखरों को
रेतीले टीले पे
उगती नागफनी को
कहीं देखा है तुम ने
सन्नाटे को...
सुदूर फैले मैदान पे
झुके आसमान को,
जेठ की भरी दुपहरी में
हाँक लगाते हरकारे को
रात के किसी पहर में
चीखते-चिललाते चमगादडों को
जब कोई शाम उदास हो जाए
चाँद से मुलाकात न हो पाए
पेडों के झुरमुटों में
दिल के किसी कोने में
जिंदगी और जिंदगी
मोत और मोत
के बीच कहीं सन्नाटा है
--------दूर कहीं सन्नाटा है , से
कभी जाना है तुम ने ।
दूर तक फैले पर्वतों को
सदियो से खामोश
पत्थरों को..
बर्फ की चादर ओढे
शिखरों को
रेतीले टीले पे
उगती नागफनी को
कहीं देखा है तुम ने
सन्नाटे को...

सुदूर फैले मैदान पे
झुके आसमान को,
जेठ की भरी दुपहरी में
हाँक लगाते हरकारे को
रात के किसी पहर में
चीखते-चिललाते चमगादडों को
जब कोई शाम उदास हो जाए
चाँद से मुलाकात न हो पाए
पेडों के झुरमुटों में
दिल के किसी कोने में
जिंदगी और जिंदगी
मोत और मोत
के बीच कहीं सन्नाटा है
--------दूर कहीं सन्नाटा है , से
बुधवार, 12 नवंबर 2008
प्रतिरूप मानव.....
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